
पत्रकार का दर्द
लेखक : महताब अंसारी
सच लिखना अब आसान कहाँ,
हर शब्द पर पहरा रहता है,
जो आईना समाज को दिखाए,
वही सबसे ज्यादा सहता है।
कलम उठी तो सवाल उठे,
सत्ता को यह मंजूर न था,
जो सच जनता तक पहुँचा दे,
उसका बच पाना दूर न था।
भीड़ के बीच अकेला पत्रकार,
अपनी जान हथेली पर रखता है,
कभी धमकी, कभी अपमान,
फिर भी सच लिखता रहता है।
उसकी आवाज दबाने को,
झूठ का शोर मचाया जाता है,
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को,
सरेआम डराया जाता है।
लेकिन कलम कभी झुकती नहीं,
सच की लौ बुझती नहीं,
जितना दबाओगे आवाज को,
उतनी बुलंद होकर निकलती है वहीं।
पत्रकार सिर्फ एक नाम नहीं,
जनता की उम्मीद होता है,
उसकी लड़ाई खुद के लिए नहीं,
हर बेबस की जीत होता है।
जो सच के रास्ते चलते हैं,
उनका दर्द कोई क्या जाने,
घाव छुपाकर मुस्कुराते हैं,
फिर भी सच के गीत सुनाने।
सलाम उन कलमकारों को,
जो हर डर से लड़ जाते हैं,
सच की खातिर इस दुनिया में,
खुद दर्द सहकर भी लिख जाते हैं।
त्रिलोकी नाथ डिस्ट्रिक्ट रिपोर्टर गयाजी बिहार
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